भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे कविता || रमानाथ अवस्थी

भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे कविता || रमानाथ अवस्थी

भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे कविता || रमानाथ अवस्थी



भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे 
जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे 

जाना-अनजाना शोर आता बिन बुलाए 
जीवन की आग को आवाज़ में छिपाए 
दूर-दूर काली रात साँए-साँए करती 
मन में जाने कैसे-कैसे रंग भरती 

अनजाना, अनथाहा अंधकार बार-बार 
करता है तारों से जाने क्या इशारे

चारों ओर बिखरे हैं धूल भरे रास्ते 
पता नहीं इनमें है कौन मेरे वास्ते 
जाने कहाँ जाने के लिए हूँ यहाँ आया 
किसी देवी-देवता ने नहीं यह बताया 

मिलने को मिलता है सारा ही ज़माना 
एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे

तन चाहे कहीं भी हो, मन है सफ़र में 
हुआ मैं पराया जैसा अपने ही घर में 
सूरज की आग मेरे साथ-साथ चलती 
चाँदनी से मिली-जुली रात मुझे छलती
 

तन की थकन तो उतार ली है पथ ने 
जाने कौन मन की थकन को उतारे

कोई नहीं लगा मुझे अपना-पराया 
दिल से मिला जो उसे दिल से लगाया 
भेदभाव नहीं किया शूल या सुमन से 
पाप-पुण्य जो भी किया, किया पूरे मन से 

जैसा भी हूँ, वैसा ही हूँ समय के सामने 
चाहे मुझे नाश करे, चाहे यह सँवारे। 


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